मै दरियाये सैलाब हूं
बे आवाज बहती जाउंगी
पत्थरों के बीच से टकरा कर
चूर हो जाउंगी
और टूटे हुये जिस्म को लेकर
आगे बढ़ जाउंगी
जाना तो है
रास्ता भी है
थोड़ा दुर्गम है
थोड़ा कष्ट भरा है
इन कष्टों के बीच में से
अपनी खिलखिलाने की आवाज
सुना जाउंगी
जरूरत है उन लोगो को जो थके है
थक गये है क्यों की गन्दे हो गये है
उसे धोने के लिये
मेरा चलना जरूरी है
मेरा बहना जरूरी है
मंगलवार, 1 अगस्त 2017
दरियाये सैलाब
बुधवार, 26 जुलाई 2017
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सोमवार, 10 जुलाई 2017
चांद बेखबर
ऐ चांद बेखबर मुस्कुराता है तू अगर तो सुन ऐ मुसाफिर तेरी मंजिल है दर बदर जानता है तू क्यूं है बेकदर तेरे जानिब का वक्षस्थल इतना विशाल है तेेरे आने की उसको नही होती है कोई खबर
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